कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भारत-अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित ट्रेड फ्रेमवर्क (India-US Trade Framework) की आलोचना करते हुए केंद्र सरकार पर तीखे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि यह समझौता भारतीय किसानों और कृषि क्षेत्र के हितों के लिए गंभीर ख़तरा पैदा कर सकता है तथा अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात से स्थानीय कृषि बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस बयान ने व्यापारिक नीति पर राजनीतिक बहस को और गहरा कर दिया है।
सुरजेवाला की प्रतिक्रिया उस समय आई है जब दोनों देशों ने अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की है, जिसमें व्यापार बाधाओं को कम करने और द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर सहमति बनी है। हालांकि सरकार का कहना है कि संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पाद प्रदूषण (ड्यूटी रियायत) से सुरक्षित हैं, विपक्ष इससे असंतुष्ट है।
क्या हुआ – ट्रेड फ्रेमवर्क पर सुरजेवाला की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने शनिवार को पंजाब के पंचकूला से भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क की कड़ी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता भारतीय किसानों की आजीविका के लिए गंभीर संवेदनशीलता पैदा करेगा, क्योंकि अमेरिकी कृषि और कृषि से जुड़े प्रसंस्कृत उत्पादों का भारतीय बाजार में निर्यात-उन्मुख आयात (import) बढ़ेगा।
सुरजेवाला ने कहा कि यह समझौता हमारे किसानों को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर जब भारत पहले से ही कृषि क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने पूछा कि क्या अमेरिकी कृषि वस्तुएँ जैसे कॉटन, मक्का, सोयाबीन, ताजे फल आदि बिना भारी शुल्क (zero duty) भारत में आयात होंगे, और इससे भारतीय किसानों को आगे क्या स्थिति का सामना करना पड़ेगा।
पृष्ठभूमि – India-US Interim Trade Framework की रूपरेखा
भारत और अमेरिका ने 6 फरवरी 2026 को व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में एक अंतरिम व्यापार ढांचे (interim trade framework) पर सहमति जताई है। इस समझौते के तहत कलाकार, उद्योग और कृषि क्षेत्र सहित कई क्षेत्रों में टैरिफ (शुल्क) में कटौती या हटाने पर बातचीत की जा रही है और इसे एक बड़े तय किए जाने वाले व्यापार समझौते की नींव के रूप में देखा जा रहा है।
रूपरेखा के अनुसार, भारत कई अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क को कम या समाप्त करेगा, जिसमें कुछ खाद्य और कृषि वस्तुएँ भी शामिल हैं। वहीं, अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर प्रतिवर्ती शुल्क 18 प्रतिशत लागू करेगा, जो पहले 50 प्रतिशत था। इसके साथ ही, दोनों देशों ने उच्च स्तर के द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत जारी रखने पर भी सहमति जताई है। (AP News)
सरकार का कहना है कि इस ढांचे का उद्देश्य दुनिया के सबसे बड़े अर्थव्यवस्थाओं में से एक के साथ व्यापारिक संपर्क और बाजार पहुंच को बढ़ाना है, जिससे निर्यातियों, मछुआरों, एमएसएमई और किसानों को वैश्विक अवसर मिलेंगे। हालांकि विपक्ष इसे देश के हितों के खिलाफ मान रहा है।
सरकारी प्रतिक्रिया: कृषि और संवेदनशील सेक्टर सुरक्षित हैं
केंद्र सरकार और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार कहा है कि इस समझौते में संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है, जिनमे गेहूं, चावल, सोयाबीन, डेयरी जैसे दुध के उत्पाद शामिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समझौता भारतीय किसानों के हित का संरक्षण करेगा और उन्हें नुकसान नहीं होने देगा।
सरकार के अनुसार, केवल उन कृषि वस्तुओं पर शुल्क में कटौती या आसान आयात की अनुमति दी जा सकती है जिनका भारत में उत्पादन कम है और जिनसे घरेलू कृषि पर अपेक्षाकृत कम दबाव पड़ेगा। ऐसे कदम भारत के कृषि निर्यातकों को लाभ दे सकते हैं और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा का अवसर बढ़ा सकते हैं।
केंद्र ने यह भी बताया कि इस समझौते से घरेलू कृषि और डेयरी किसान पूरी तरह सुरक्षित हैं और किसी भी संवेदनशील वस्तु पर कोई भी रियायत नहीं दी गई है।
विवाद का केंद्र – अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात
रणदीप सिंह सुरजेवाला की आलोचना का मुख्य आधार यह है कि यदि अमेरिकी कृषि उत्पाद शुल्क में बड़ी कटौती या शून्य शुल्क (zero duty) पर भारत में आयात होंगे, तो यह भारतीय कृषि बाजार के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी कृषि वस्तुएँ भारत में बड़े पैमाने पर पहुंच सकती हैं और इससे छोटे और सीमांत किसानों के लिये बाजार प्रतिस्पर्धा खतरे में पड़ सकती है।
Surjewala ने यह भी कहा कि यदि अमेरिका से कृषि उत्पादों का विस्तार भारत में होता है, तो यह भारतीय किसानों की आजीविका पर सीधा प्रभाव डालेगा, जिससे ग्रामीण भारत के करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी जोखिम में पड़ेगी।
सुरजेवाला ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने इसे सार्वजनिक और संसद के सामने खुलकर नहीं रखा, जिससे देश के किसानों को समझौते के वास्तविक प्रभावों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही है। वे चाहते हैं कि संसद में इस समझौते पर व्यापक चर्चा और पूर्ण विवरण पेश किया जाए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और विपक्षी दलों की समर्थन
सुरजेवाला के बयान के बाद विपक्षी दलों में भी प्रतिक्रिया तेज हुई है। पंजाब विधानसभा के विपक्ष नेता भाग्य सिंह बाजवा ने कहा है कि इस समझौते से भारतीय अखिल भारतीय किसान केवल नए आयात की चुनौती का सामना नहीं करेंगे, बल्कि वे अमेरिकी कृषि उत्पादों के अत्यधिक सब्सिडी वाले प्रतिस्पर्धियों का सामना करेंगे, जो भारतीय कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
इसी तरह किसान संगठनों ने भी चिंता जताई है कि यह व्यापार समझौता अमेरिकी कृषि वस्तुओं को भारतीय बाजार में खड़ा कर सकता है और इससे स्थानीय कृषि उत्पादकों के लिये मूल्य प्रतिस्पर्धा में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि इस तरह के समझौते में पारदर्शिता की कमी और किसानों तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में सार्वजनिक बहस की आवश्यकता है।
भारत-US ट्रेड फ्रेमवर्क का व्यापक परिप्रेक्ष्य
भारत-US interim trade framework को वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को विकसित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें टैरिफ की कटौती, आपसी बाजार पहुंच, निवेश, तकनीकी साझेदारी और कृषि व्यापार शामिल हैं।
सरकार का दावा है कि यह समझौता भारत के निर्यातकों और उद्योगों के लिये अवसर पैदा करेगा, जिससे नौकरियों में वृद्धि होने की संभावना है और वैश्विक सप्लाई चेन के भीतर भारत की भूमिका मजबूत होगी। हालांकि, विपक्ष का मानना है कि इसकी लागत किसानों और कृषि आधारित लघु उद्योगों पर पड़ेगी, खासकर जब अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात बढ़ेगा।
▪ विपक्ष मांग कर रहा है कि पारliament में विस्तृत चर्चा हो और समझौते की पूरी सामग्री पारदर्शी रूप से प्रस्तुत की जाए।
▪ किसान संगठन आगामी प्रतिक्रिया और आंदोलन योजना पर विचार कर रहे हैं, जिससे वे अपनी चिंताओं को उजागर कर सकें।
▪ केंद्र सरकार संभावित आख़िरी रूप देने वाली बातचीत को जारी रख सकती है और संयुक्त बयान जल्द जारी होने की संभावना जताई गई है।
कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने India-US trade framework पर कड़े बयान दिये हैं, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार की नीति को किसानों और कृषि क्षेत्र के हितों के खिलाफ बताया है। उन्होंने इस समझौते को भारतीय कृषि बाजार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला बताया है और सवाल उठाया है कि क्या यह व्यापारिक ढांचा सच में देश के किसानों तथा स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा करेगा या नहीं।



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